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Home > Blog > श्राद्ध और आत्म तत्व का महाविज्ञान | पितृ तर्पण का महत्व

श्राद्ध और आत्म तत्व के संबंध का महाविज्ञान 

काल का प्रभाव और दुर्लभ मनुष्य शरीर सनातन धर्म में जो काल की व्याख्या की जाती है, उसे इस ब्रह्मांड में अनवरत और शाश्वत माना गया है। इस काल पास में बंधा हुआ संसार का चक्र 84 लाख योनियों में चल रहा है। 

इस चक्र में गति करने के लिए कर्म रूपी प्रधान मार्ग है। विधाता ने इस काल का जब निर्माण किया तो, इन 84 लाख योनियों में बंधने के लिए मनुष्य के कर्म को प्रधान रूप से जिम्मेदार बना दिया। मनुष्य का जन्म इन 84 लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ और अत्यंत दुर्लभ है। पृथ्वी पर देवता भी मनुष्य का शरीर धारण करने के लिए तरसते रहते हैं।

सनातन हिंदू धर्म की एक ऐसी दिव्य अलख जग रही है जो, जो कर्मवाद के पृष्ठभूमि पर खड़ी है। यानी जिस प्रकार का मनुष्य कर्म अपने जीवन काल में करता है, उसे उसी प्रकार की गति और योनि प्राप्त होती है। मनुष्य की योनि ऐसी है,जिसमें अच्छे कर्म करके जीव मोक्ष प्राप्त कर सकता है। यही सनातन धर्म के वेद शास्त्रों का सार है। अच्छे कर्म और अच्छे आचरण अच्छा व्यवहार परोपकार धर्म न्याय अहिंसा ईश्वर भक्ति सदाचार सत्य वचन यह सब अच्छे कर्म की श्रेणी में आते हैं। मनुष्य का शरीर या जन्म एक ऐसा साधन है, जिससे मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। 

इसे रामचरितमानस में रेखांकित करते हुए स्पष्ट कहा गया है।

“आकर चारि लाख चौरासी। जोनि भ्रमत यह जीव अविनाशी॥

साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥”

मनुष्य का शरीर अत्यंत दुर्लभ है, इसे दूसरी चौपाई में रामचरितमानस में इस प्रकार कहा गया है:

“राम राम कहो राम सनेही, नर समान नहीं कौनो देही।”

अर्थात्, हे जीव! राम का स्मरण करो और उनसे सनेह (प्रेम) करो, क्योंकि इस संपूर्ण चराचर जगत में मनुष्य देह के समान श्रेष्ठ, चैतन्य और सौभाग्यशाली अन्य कोई शरीर नहीं है।

शरीर नश्वर है: 

इस मनुष्य के परम दुर्लभ शरीर के साथ एक ध्रुव सत्य जुड़ा हुआ है जो, सदैव शाश्वत और निश्चित है—मृत्यु। जिसने इस भौतिक संसार में जन्म लिया है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है। भगवान श्रीकृष्ण गीता में अर्जुन से कहते हैं:

“जातस्य ही ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।” (गीता 2.27)

अर्थात्, जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का पुनर्जन्म निश्चित है। यह संसार नश्वर है, देह पंचतत्व में विलीन हो जाती है, लेकिन इस देह के भीतर जो चेतना है, जो मुख्य सूत्रधार है, वह कभी नष्ट नहीं होता।

श्रीमद् भागवत गीता का यह उद्घोष भगवान श्री कृष्ण के मुखारविंद से हुआ वह यह बताता है कि, मनुष्य केवल नष्ट होता है उसका स्थूल शरीर जो हड्डियों मांस रक्त के ढांचे से निर्मित है, उसमें सूक्ष्म शरीर में वास करने वाला आत्म तत्व हमेशा अमर है, वह कभी मरता ही नहीं। ना वह कभी बूढ़ा नहीं होता है और ना किसी दुर्घटना में नष्ट होता है। इसके संबंध में श्रीमद् भागवत गीता के दूसरे अध्याय का यह श्लोक उद्घाटित करता है:

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत॥” (गीता 2.23)

भावार्थ: इस आत्म-तत्व को कोई भी शस्त्र काट नहीं सकता, अग्नि इसे जला नहीं सकती, जल इसे गीला नहीं कर सकता (यानी डूबा नहीं सकता) और वायु इसे सुखा नहीं सकती।

यह कोई कल्पना नहीं बल्कि ठोस प्रमाण है और यह कोई अंधविश्वास नहीं बल्कि आत्म तत्व के अमर होने का सबसे बड़ा चेतना का महा विज्ञान है। मनुष्य की आत्मा कभी मरती नहीं है। ठीक उसी प्रकार जैसे मनुष्य कपड़ों को त्याग करके वस्त्र धारण करता है। इसी प्रकार आत्म तत्व इस शरीर को धारण करता है और जैसे ही यह शरीर जीर्ण होता है, वैसे ही आत्म तत्व शरीर को छोड़कर अपने दूसरे यात्रा के अगले पड़ाव में निकल पड़ता है। 

जब इस भौतिक शरीर को जब आत्मा त्यागती है। तो उसके साथ उसकी इच्छाएं उसके संस्कार वासनाएं और घर परिवार माता-पिता पुत्र स्त्री के प्रति मोह बना हुआ रहता है। किंतु विधि का विधान यानी ब्रह्म के जो अवतार के नियम हैं, आत्म तत्व इन्हीं वासनाओं के सहारे घूमता रहता है और वह इन सूचना तरंगों के द्वारा अपने घर परिवार और संतान से यह आशा करता है कि, पितृपक्ष में उसे तर्पण के द्वारा जो जलांजलि मिलेगी और श्राद्ध में जो अन्न दान पंचवली दी जाएगी उससे वह तृप्त होगा।

 शास्त्रों का ऐसा वर्णन है कि, पितरों का तर्पण और श्राद्ध जो किया जाता है, वह सीधे तौर पर उन्हें प्राप्त होता है। वह जिस योनि में जिस रूप में होते हैं, उसी योनि और उसी के अनुकूल वह भोज्य पदार्थ बनकर उन्हें प्राप्त होता है। क्योंकि सूक्ष्म ऊर्जा का जो प्रवाह है, वह है उन तक पहुंचा देता है, जिस प्रकार से देवताओं को दी गई आहुति उन्हें प्राप्त होती है। इसी प्रकार विधि के नियम के अनुसार पितरों का तर्पण और श्राद्ध तथा दान सीधे उन्हीं को प्राप्त होता है।

सनातन धर्म में जो उल्लेख मिलता है, वह स्पष्ट तौर से यह बताता है कि, पितरों के निमित्र श्राद्ध करने की पहली शर्त है, श्रद्धा विश्वास दूसरी पवित्रता, तीसरा दान और दक्षिणा और ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए तथा दान पुण्य के द्वारा ब्राह्मण भोजन के द्वारा करना चाहिए। श्राद्ध के समय प्रत्येक श्राद्धकर्ता को पवित्रता और ब्रह्मचार का पालन करना चाहिए। यानी पति और पत्नी को वैवाहिक जीवन में सामंजस्य बनाते हुए रहना चाहिए। विचारों की पवित्रता और ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य रूप से करना चाहिए। मन को इधर-उधर भागने न दें, मन को इस दौरान संभाल कर रखना चाहिए।

श्राद्ध के दौरान प्रत्येक व्यक्ति को जो अपने दिवंगत पितरों का श्राद्ध करता है। उसके लिए यह नियम जरूरी है। जैसे श्राद्ध के समय में भूलकर भी क्षौर कर्म यानी दाढ़ी और बाल नहीं बनवाना चाहिए। ऐसा करने से श्राद्ध का जो फल है, वह नष्ट होता है और व्यक्तियों को पूर्ण फल नहीं मिलता। क्योंकि यह पितृ महायज्ञ का वह पहलू है, जिसमें सुचिता और ब्रह्मचर्य तथा अन्य नियमों का पालन बहुत जरूरी है। यदि कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो उसकी श्राद्ध का किया हुआ फल उनके पूर्वजों को नहीं मिलता है। यहां पर नाखून और बाल काटने का निषेध प्राप्त होता है। अतः किसी को श्राद्ध के दौरान नाखून नहीं काटने चाहिए। बाल दाढ़ी नहीं बनवाना चाहिए।

श्राद्ध के दौरान किसी मांगलिक कार्य को नहीं करना चाहिए। जैसे सगाई गोद भराई और जमीन को खरीदना गाड़ी को खरीदना, नौकरी नए घर में प्रवेश यह सब मांगलिक जो कार्य है, इन्हें श्राद्ध के दौरान बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त श्राद्ध में नया वस्त्र आभूषण भौतिक वस्तुएं कदापि नहीं खरीदना चाहिए। इस दौरान आप मृत्यु हुए पितरों के निमित्त श्राद्ध का सामान खरीद सकते हैं। 

इस दौरान ऐसी लोग मान्यता और परंपरा प्रचलित है कि, बाजार से नमक नहीं खरीदना चाहिए। सरसों का तेल नहीं खरीदना चाहिए। और झाड़ू जो घर में सफाई के काम आती है, सफाई और पवित्रता में लक्ष्मी का वास होता है, इसलिए लक्ष्मी का एक प्रतीक झाड़ू को भी माना जाता है। इसलिए इस दौरान झाड़ू नहीं खरीदने की लोक मान्यता प्रचलित है।

तर्पण का वैज्ञानिक महत्व: वैदिक मंत्रों की शक्ति और काले तिल तथा जल का जो पावर है, वह तरंगों के माध्यम से ब्रह्मांड में ऐसी रश्मियों के साथ अपना संपर्क बनाता है, जो हमारे पूर्वजों को प्राप्त होता है। 

पितृ तर्पण के विषय में स्मृतियों में वर्णन मिलता है कि, हमारे ऊपर देव पितृ ऋण, ऋषि ऋण, तीन प्रकार के प्रमुख रूप से कर्ज चढ़े हुए रहते हैं। इसलिए यह समय तीनों कर्ज से मुक्त होने का मार्ग है। इस मार्ग में चलकर ही व्यक्ति इन तीनों ऋणों से मुक्त हो सकता है। 

तर्पण में सबसे पहले देवताओं का तर्पण होता है। इसके बाद ऋषियों का इसके पश्चात दिव्य मनुष्यों का इसके पश्चात पितरों का तर्पण और इसके पश्चात द्वितीय गोत्र का तर्पण इसके बाद परिवार में अकाल मृत्यु प्राप्त हुए तथा जिनके संतान नहीं है अज्ञात तर्पण किया जाता है।

श्रद्धया क्रियते इति श्राद्धम्।” जो पूरे श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ किया जाए वही श्राद्ध है। इस पृथ्वी लोक से जब कोई भी संतान अपने दिवंगत पितरों के लिए श्रद्धा भाव से और कृतज्ञता से उनके निमित्त दान और श्राद्ध करते हैं, भोजन ब्राह्मणों को कराते हैं। यानी हमारे मृत पितरों के लिए श्राद्ध एक ऐसा मार्ग है, जिसके द्वारा उनके संतति द्वारा किया गया श्राद्ध तर्पण सीधे उनके पास पहुंचता है और उनसे उनको गति और मोक्ष मिलती है। यानी श्राद्ध कर्म सबके लिए अनिवार्य रूप से करना चाहिए, कोई भी पितृ हो सभी का अलग-अलग श्राद्ध विधान होता है, उनकी तिथियों में ही श्राद्ध किया जाना चाहिए।

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मंगल भवन के इस लेख में आचार्य अंकुश के द्वारा अपने प्रथम भाग में पितृ पक्ष के संबंध में महत्वपूर्ण तथ्यों को जाना समझा अब हम इसके दूसरे और तीसरे भाग भाग मे जानेंगे कि पितृ के तर्पण का महत्व और गया श्राद्ध ब्रह्म कपाली का क्या महत्व है।

Q1. श्राद्ध और आत्म तत्व का क्या संबंध है?

An. सनातन परंपरा के अनुसार श्राद्ध कर्म दिवंगत पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और तर्पण की धार्मिक प्रक्रिया है, जिसका संबंध आत्म तत्व और पितृ तृप्ति से माना जाता है।

Q2. श्राद्ध का वास्तविक अर्थ क्या है?

An. ‘श्रद्धया क्रियते इति श्राद्धम्’ के अनुसार श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ पितरों के निमित्त किए गए कर्म को श्राद्ध कहा जाता है।

Q3. पितृ तर्पण क्यों किया जाता है?

An. पितृ तर्पण पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने तथा पितृ ऋण से मुक्ति की धार्मिक भावना से किया जाता है।

Q4. श्राद्ध के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

An. श्राद्ध के समय पवित्रता, श्रद्धा, संयम, दान, तर्पण और निर्धारित धार्मिक विधि का पालन महत्वपूर्ण माना जाता है।

Q5. क्या श्राद्ध के समय मांगलिक कार्य किए जाते हैं?

An. कई हिंदू परंपराओं में पितृपक्ष के दौरान विवाह, सगाई और अन्य मांगलिक कार्यों को टालने की मान्यता है। क्षेत्र और परंपरा के अनुसार नियम अलग हो सकते हैं।

Q6. पितृपक्ष में तर्पण का क्या महत्व है?

An. धार्मिक मान्यता के अनुसार तर्पण जल, तिल और मंत्रों के माध्यम से पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने की महत्वपूर्ण विधि है।

Q7. क्या श्राद्ध सभी पितरों के लिए अलग-अलग किया जाता है?

An. परंपरागत रूप से श्राद्ध संबंधित पितर की मृत्यु तिथि के अनुसार करने की मान्यता है। तिथि ज्ञात न होने पर विभिन्न परंपराओं में अलग विधान बताए गए हैं।

Q8. आत्म तत्व के बारे में भगवद्गीता क्या कहती है?

An. भगवद्गीता में आत्मा को अविनाशी बताया गया है। गीता 2.23 में आत्मा को शस्त्र, अग्नि, जल और वायु से अप्रभावित बताया गया है।

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