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Home > Blog > सिंह लग्न में शुक्र ग्रह ! सूर्य की राशि में क्या? कमाल दिखाएंगे प्रेम और सौन्दर्य के कारक ग्रह शुक्र |

ज्योतिष शास्त्र एक ऐसा पहलू है, जहां आपको अपने सभी सवाल और जीवन के लिए सही मार्गदर्शन बहुत ही आसानी से मिल जाएगा। क्योंकि, हम सभी के जीवन में बहुत सी ऐसी घटनाएं होती है, जो हमारी मानसिक शांति को भंग कर सकती है। ये घटनाएं आपके करियर, प्रेम, विवाह या पारिवारिक जीवन से जुड़ी हुई हो सकती हैं। लेकिन, आपको चिंता करने की जरुरत नहीं है। आपको हमारे ‘मंगल भवन’ के ज्योतिष आचार्यों से आपकी हर समस्या का समाधान मिल जाएगा। 

ज्योतिष शास्त्र में, सूर्य ग्रह की इस राशि में, प्रेम के कारक ग्रह विशेष रूप से तीसरे (पराक्रम) और दसवें (कर्म) भाव का स्वामी है। जिनके शुभ प्रभाव से जातक कला, सौंदर्य और रचनात्मक कार्यों में श्रेष्ठता प्राप्त करते हैं। जिससे करियर (खासकर मीडिया, अभिनय) में अद्भुत सफलता मिलती है। 

लेकिन, यह भी तभी संभव है, जब कुंडली में सम (न मित्र, न शत्रु) ग्रह साथ होते हैं। इसलिए, भाव के अनुसार जातक को शुभ-अशुभ फल मिलते हैं। सिंह लग्न की जन्म कुंडली में, शुक्र ग्रह विशेष रूप से पहले, चौथे, पांचवें, सातवें, नौवें, दसवें और ग्यारहवें भाव में शुभ और दूसरे, तीसरे, छठे, आठवें, बारहवें भाव में अशुभ प्रभाव देने वाले होते हैं। 

जिसमें जातक को धन, सुख, रिश्तों और वाणी से संबंधित परिणाम देखने को मिलते हैं। लेकिन उसकी स्थिति भी भाव और अन्य ग्रहों पर निर्भर करती है। जिससे जातक आकर्षक, आत्मविश्वासी और सफल होता है।  लेकिन, अशुभ प्रभाव में उसे संघर्ष करना पड़ सकता है। 

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस लग्न कुंडली में शुक्र देवता तीसरे और दसवें भाव के स्वामी है। इसके साथ ही, सिंह राशि सूर्य देव की प्रधान राशि है। जिसके कारण विरोधी होने के नाते वे इस लग्न में सम ग्रह माने जाते हैं। गणना करने पर यदि शुभ\अशुभ भावों की बात करें तो, पहले, चौथे, पांचवें, सातवें, नौवें, दसवें और ग्यारहवें भाव में शुक्र ग्रह अपनी दशा-अंतर्दशा में अपनी क्षमता अनुसार जातक के लिए शुभ फल देते हैं। दूसरे (नीच), तीसरे, छठे, आठवें, व बारहवें भाव में शुक्र ग्रह जातक को अशुभ प्रभाव देते हैं। शुक्र को मजबूत करने के लिए जातक को शुक्र से संबंधित दान व पाठ करके शुक्र के बल को बढ़ाने के सुझाव दिए जाते हैं।

  • ज्योतिष में सिंह लग्न के जातकों के विशेष गुण के बारे में बताया गया है। इस राशि के जातकों में सिंह के समान श्रेष्ठ नेतृत्व के गुण होते हैं। इसके साथ ही ये जातक, आत्मविश्वासी, शाही और प्रभावशाली होते हैं, जो सूर्य के समान तेजवान होते हैं।
  • ज्योतिष में सूर्य, स्वयं लग्नेश है, अतः जब बलवान हो या लग्न में हो तो शुभ प्रभावशाली होता है। जिससे जातक को राज्य आदि का सुख प्राप्त होता है। इसके साथ ही, इस लग्न वाले जातक के स्वामी सूर्य देव होते हैं। अतः उनमें सूर्य के अधिकांश गुण व दोष आ जाते हैं। 
  • लग्न कुंडली में यदि सूर्य बलवान हो तो ऐसे जातक साहसी, वीर, शासन की अद्भुत क्षमता को प्राप्त करने वाले, बलशाली और विशाल हृदय के, मजबूत हड्डी वाले, उदार स्वभाव के और सात्विक प्रवृत्ति के होते हैं।
  • इसके विपरीत यदि सूर्य निर्बल, पापयुक्त या पाप ग्रहों की दृष्टि में हो तो वे अपमानित, आंख के रोग वाले, हृदय के तथा पेट के रोगों से युक्त और राज्य के विरोधी होते हैं।
  • ग्रहों की बात करें तो, यदि सूर्य, बुध और मंगल की (दृष्टि या युति) द्वारा परस्पर संबंधित हों, तो ऐसे जातक बहुत धनवान होते हैं। उनके पास कभी धन की कमी नहीं होती है। क्योंकि, सूर्य लग्नेश होने के कारण धन के प्रदाता प्रतिनिधि हो जाते हैं। 
  • बुध धन भाव का स्वामी होने से धन के प्रतिनिधि होते हैं और मंगल केन्द्र और कोण का स्वामी होने से विशेष धनदायक राज योगकारक ग्रह होंगे। इसलिए धन द्योतक ग्रहों का पारस्परिक संबंध धन लाभ और सम्पन्नता की प्रचुरता देने वाले होते हैं।

यदि लग्न कुंडली में, शुक्र बलवान हो तो वह अपनी दशा के अंतर्गत जातक को मित्रों से सहायता और अच्छा सपोर्ट देने का कारक होता है। छोटे भाइयों को सफलता और अच्छे मित्रों की संगति देने का कारक होता है। शुक्र की दशा में जातक अपने तेज, ऊर्जा और पराक्रम का परिचय देता है, परन्तु धन के मामलों में कुछ साधारण रहता है ।

इसके अलावा, यदि लग्न में शुक्र निर्बल और पीड़ित स्थिति में हो तो जातक को मित्रों तथा भाइयों से कोई सहायता नहीं मिलती है। परन्तु, ऐसे जातक की आय व धन की आवक बहुत अच्छी रहती है। कुछ बुरी संगत में, मित्रों के कारण कार्यों में असफलता मिलती है। साथ ही ऐसे जातक अधिक भोग विलास तथा व्यर्थ की व्यसनी या लम्पटता की ओर अधिक प्रवृत्त रहता है।

ज्योतिष में शुक्र ग्रह के बलि और कमजोर होने पर जातक के जीवन में शुक्र के शुभ\अशुभ प्रभाव देखने को मिलते हैं। आइये जान लेते हैं, शुक्र के शुभ\अशुभ प्रभाव के बारे में-

  1. सिंह लग्न में शुक्र के शुभ प्रभाव से जातक सुंदर, आकर्षक और कलात्मक होता है। जो गायक, नर्तक, चित्रकार या एक कुशल अभिनेता बन सकते हैं।
  2. भौतिक सुख-सुविधा, विलासितापूर्ण जीवन और धन-संपत्ति का सुख मिलता है।
  3. योग्य और उत्तम जीवनसाथी, मधुर संबंध और वैवाहिक सुख की प्राप्ति होती है।
  4. शुक्र के प्रभाव में, जातक को कला, फैशन, डिजाइनिंग और अन्य रचनात्मक क्षेत्रों में विशेष रुचि और सफलता मिलती है।
  5. ऐसे जातक की वाणी मधुर होती है और वह दूसरों में बहुत प्रिय होता है। 
  1. सिंह लग्न में शुक्र के अशुभ प्रभाव से जातक में कभी-कभी इच्छाओं की अधिक वृद्धि हो सकती है।
  2. यदि शुक्र पीड़ित हो, ऐसे जातक की विवाह में बाधाएं आती हैं या वैवाहिक जीवन अच्छा नहीं रहता है।
  3. शुक्र के अशुभ प्रभाव में जातक को धन सम्बन्धी समस्या आती है 
  4. अशुभ शुक्र के प्रभाव से जातक अत्यधिक भोग-विलास की इच्छा करने वाला होता है।

पहले भाव में शुक्र, शत्रु सूर्य की राशि में होने से जातक को शारीरिक सौंदर्य, श्रृंगार, यश और प्रभावशाली व्यक्तित्व प्रदान करता है। ऐसे जातक को भाई बहन व पिता से मतभेद होते हुए भी सुख मिलता है। शुक्र के साथ में मित्र ग्रहों के प्रभाव से जातक को स्त्री से सफलता और दैनिक व्यवसाय में धन लाभ मिलता है।

दूसरे भाव में शुक्र ग्रह अपने मित्र बुध की राशि पर होने से जातक को धन तथा कुटुंब परिवार से अल्प सुख देने वाला होता है। ऐसे जातक को राजकीय कार्यों में असफलता मिल सकती है, परंतु वह ऐश्वर्यवान जीवन व्यतीत करता है।

सिंह लग्न के तीसरे भाव में शुक्र स्वराशि में होने से जातक के पराक्रम में वृद्धि करने वाले होते हैं। ऐसे जातक को भाई-बहन का सुख मिलता है व पिता के राज्य या व्यवसाय द्वारा भी लाभ होता है। शुक्र की शुभ दृष्टि से जातक अपने पुरुषार्थ द्वारा भाग्य तथा धर्म की वृद्धि करता है। साथ ही वह योग्य व परिश्रमी होता है।

सिंह लग्न के चौथे भाव में शुक्र अपने शत्रु ग्रह मंगल की राशि में होने के जातक को माता के साथ सामान्य मतभेद देने के कारक होते हैं। परंतु ऐसे जातक को भूमि\ भवन का लाभ प्राप्त होता है।

सिंह लग्न के पांचवे भाव में, शुक्र अपने शत्रु गुरु बृहस्पति की राशि में होने से जातक को विद्या बुद्धि व संतान के क्षेत्र में अच्छे परिणाम व सफलता देते हैं। ऐसे जातक को, भाई-बहन व पिता का सुख भी प्राप्त होता है, वह अपनी योग्यता व चतुराई के बल पर बहुत अधिक सम्मान प्राप्त करता है।

सिंह लग्न के छठे भाव में शुक्र अपने मित्र शनि की राशि में होने से जातक को चतुर, प्रभावशाली व शत्रु पर विजय पाने वाला बनाते हैं। ऐसे जातक का अपने पिता के साथ सामान्य मतभेद रहता है परंतु राज्य पक्ष में वह सफलता प्राप्त करता है। साथ ही ऐसे जातक अपनी श्रेष्ठ युक्तियों के बल पर सफलता प्राप्त करता है।

सिंह लग्न के सातवें भाव में शुक्र शनि की राशि पर होने के कारण जातक को स्त्री व व्यवसाय के क्षेत्र में विशेष सफलता देने वाले होते हैं। ऐसे जातक को अपने भाई-बहन का सहयोग व पिता का सुख मिलता है। साथ ही वह कुशलता पूर्वक गृहस्थी का संचालन करता है। ऐसा जातक बहादुर व हुकूमत करने वाला होता है।

सिंह लग्न के आठवें भाव में शुक्र ग्रह के अपने शत्रु ग्रह गुरु बृहस्पति की राशि में होने पर जातक को आयु व पुरातत्व का लाभ देने वाले होते हैं। ऐसे जातक अपने दैनिक जीवन में बहुत प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं व राज्य पक्ष में भी सफलता प्राप्त करते हैं।

सिंह लग्न के नौवें भाव में शुक्र अपने शत्रु मंगल की राशि पर होने के कारण जातक को पिता पक्ष, राज्य और व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता, सुख व सम्मान देने वाले होते हैं। ऐसे जातक के भाई-बहन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। साथ ही ऐसे जातक  सुखी-संपन्न, परिश्रमी, यशस्वी व निडर होता है।

दसवें भाव में शुक्र अपनी स्वराशि में होने से जातक को पिता राज्य व्यवसाय के क्षेत्र में अधिक सफलता देने वाला होता है। ऐसे जातक को व्यवसाय के क्षेत्र में अधिक सफलता मिलती है।धन लाभ के साथ सुख भी मिलता है। साथ ही, भाई-बहन का सुख भी प्राप्त करता है। शुक्र की सातवीं शत्रु दृष्टि से जातक को माता, भूमि भवन से अच्छा सुख मिलता है। ये जातक चतुर, प्रभावशाली, परिश्रमी और भाग्यशाली होता है।

लग्न के ग्यारहवें भाव में शुक्र अपने मित्र बुध की राशि में होने से जातक की आमदनी में वृद्धि देने वाले होते हैं।

 ऐसे जातक को, भाई-बहन व पिता से श्रेष्ठ सुख मिलता है। ऐसा जातक अपनी वाणी द्वारा सब को प्रभावित करने वाले सामर्थ्य के व सुखी, धनी और यशस्वी होते है।

लग्न के बारहवें भाव में शुक्र अपने शत्रु चंद्रमा की राशि में होने से जातक का अधिक खर्च करने वाले प्रभाव में होते हैं। ऐसे जातक को, बाहरी स्थान के संबंध में लाभ होता है। पिता, भाई-बहन के सुख तथा पराक्रम में कमी रहती है ऐसे जातक शत्रु पक्ष में अपने बुद्धि के बल पर प्रभावशाली रहता है, तथा अपनी हिम्मत से विजय प्राप्त करता है। 

  1. मां लक्ष्मी और मां दुर्गा की पूजा करें,  श्री सूक्त, दुर्गा सप्तशती या देवी कवच का पाठ करें।
  2. शुक्र के बीज मंत्र, ‘ॐ शुं शुक्राय नमः’ या ‘ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः’ मंत्र का जाप करें।
  3. शुक्रवार के दिन वैभव लक्ष्मी या सामान्य रूप से व्रत रखें और माता की उपासना पुरे विश्वास व श्रद्धा से करें
  4. शंख में जल भरकर लक्ष्मी जी का अभिषेक करें और सफेद या कमल के फूल अर्पित करें।
  1. घर में बनने वाली पहली रोटी गाय को दें। गरीबों, जरूरतमंदों को अन्न का दान करें, स्त्री जाति का सम्मान करें।
  2. घर को हमेशा साफ व सुगंधित रखें और इत्र का प्रयोग करें। सफेद वस्त्र पहने और सफेद वस्तुओं का दान करें।
  3. प्रतिदिन दही और देसी घी का सेवन करें। 
  4. किसी ज्योतिष परामर्श के बाद, कुंडली में शुक्र कमजोर होने पर हीरा या ओपल धारण कर सकते हैं। 

Q. क्या, सिंह लग्न में शुक्र के प्रभाव  शुभ होते हैं?

An. इस लग्न कुंडली में शुक्र देवता तीसरे और दसवें भाव के स्वामी है। इसके साथ ही, सिंह राशि सूर्य देव की प्रधान राशि है। जिसके कारण विरोधी होने के नाते वे इस लग्न में सम ग्रह माने जाते हैं।

Q. सिंह लग्न में शुक्र के अशुभ प्रभाव में क्या होता है?

An.  सिंह लग्न में शुक्र के अशुभ प्रभाव से जातक में कभी-कभी इच्छाओं की अधिक वृद्धि हो सकती है। यदि शुक्र पीड़ित हो, ऐसे जातक की विवाह में बाधाएं आती हैं या वैवाहिक जीवन अच्छा नहीं रहता है।

Q. सिंह लग्न के बारहवें भाव में शुक्र के प्रभाव क्या होते हैं?

An. लग्न के बारहवें भाव में शुक्र अपने शत्रु चंद्रमा की राशि में होने से जातक का अधिक खर्च करने वाले प्रभाव में होते हैं। ऐसे जातक को, बाहरी स्थान के संबंध में लाभ होता है।

Q. सिंह लग्न में शुक्र की दशा में क्या होता है?

An. यदि लग्न कुंडली में, शुक्र बलवान हो तो वह अपनी दशा के अंतर्गत जातक को मित्रों से सहायता और अच्छा सपोर्ट देने का कारक होता है। छोटे भाइयों को सफलता और अच्छे मित्रों की संगति देने का कारक होता है।

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